राष्ट्रीय पोषण माह 2026 : सुपोषित भारत, साक्षर भारत, सशक्त भारत
पोषण को सरकारी अभियान नहीं, जनआंदोलन बनाने की जरूरत : डॉ. रमा मौर्या
प्रदीप मिश्रा, प्रमुख संवाददाता

Gonda News
गोंडा /बलरामपुर। भारतीय परिवारों में सामान्यत: स्वस्थ भोजन का अर्थ घर में बने भोजन से लगाया जाता है, लेकिन केवल घर का बना भोजन ही संतुलित आहार की गारंटी नहीं है। भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित समावेश न होने पर शरीर में पोषण संबंधी कमियां पैदा हो सकती हैं और लंबे समय में इसका असर स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए देश में सितंबर माह को राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य लोगों को संतुलित एवं पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करने के साथ कुपोषण की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटना है।
डॉ. रमा मौर्या, असिस्टेंट प्रोफेसर, होम साइंस एंड कम्युनिटी स्टडीज, मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय, बलरामपुर ने बताया कि राष्ट्रीय पोषण माह की शुरुआत वर्ष 2018 में पोषण अभियान के तहत की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण को कम करना तथा समाज में पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
सितंबर माह में पोषण पर विशेष जोर
राष्ट्रीय पोषण माह के दौरान पूरे सितंबर महीने में पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और संतुलित आहार से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वर्ष 2026 में ‘सुपोषित भारत, साक्षर भारत, सशक्त भारत’ के दृष्टिकोण के साथ महिलाओं, बच्चों और समुदायों में कुपोषण को दूर करने तथा समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से इस वर्ष पोषण माह के लिए पांच प्रमुख विषयों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है।
मोटापे से निपटना: रोजमर्रा के भोजन में चीनी और तेल के अत्यधिक इस्तेमाल को कम करने के लिए लोगों को जागरूक करना।
पोषण भी, पढ़ाई भी: आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा को मजबूत करना।
एक पेड़ मां के नाम: पर्यावरण संरक्षण को पोषण से जोड़ते हुए पौधारोपण को बढ़ावा देना।
शिशु एवं बाल आहार प्रथाएं: दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के बेहतर पोषण के लिए सही स्तनपान और छह माह के बाद पूरक आहार की उचित शुरुआत को प्रोत्साहित करना।
देखभाल में पुरुषों की भागीदारी: माता और बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य एवं देखभाल में पुरुषों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
पहले एक हजार दिन सबसे महत्वपूर्ण
डॉ. रमा मौर्या ने बताया कि पोषण माह का विशेष फोकस जीवन के शुरुआती एक हजार दिनों पर है। गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दो वर्ष की आयु तक का समय बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान उचित पोषण मिलने से बच्चे के विकास की नींव मजबूत होती है।
इस अभियान के प्रमुख लाभार्थियों में गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, छह वर्ष से कम उम्र के बच्चे और किशोरियां शामिल हैं। किशोरियों के पोषण पर विशेष ध्यान इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में कुपोषण के चक्र को तोड़ा जा सके।
गांव-गांव पहुंचता है पोषण का संदेश
सितंबर माह में जमीनी स्तर पर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से लोगों को पोषण के प्रति जागरूक किया जाता है। इनमें पोषण पंचायत, गोद भराई, अन्नप्राशन, हेल्दी रेसिपी प्रतियोगिताएं, स्कूलों में पोस्टर प्रतियोगिता, क्विज और जागरूकता रैलियां प्रमुख हैं।
पोषण पंचायतों में ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। वहीं गोद भराई के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को पोषण एवं मातृ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है। छह माह की आयु पूरी करने वाले बच्चों के लिए अन्नप्राशन के माध्यम से पूरक आहार की शुरुआत का संदेश दिया जाता है।
आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़कर उठाएं लाभ
यदि परिवार में गर्भवती महिला, स्तनपान कराने वाली माता अथवा छह वर्ष से कम उम्र का बच्चा है तो आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़ना बेहद महत्वपूर्ण है। वहां उपलब्ध पोषण संबंधी सेवाओं और योजनाओं का लाभ लिया जा सकता है।
सितंबर माह में बच्चों के वजन और लंबाई की निगरानी सहित पोषण स्थिति की जांच पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। इससे समय रहते यह पता लगाने में मदद मिलती है कि बच्चे का विकास सामान्य रूप से हो रहा है या उसे अतिरिक्त पोषण एवं स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है।
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, एएनएम, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से नवजात शिशु की देखभाल, सही स्तनपान और छह माह के बाद पूरक आहार की जानकारी भी दी जाती है। किशोरियों और महिलाओं को एनीमिया से बचाव के लिए हीमोग्लोबिन जांच तथा आयरन-फोलिक एसिड से संबंधित सेवाओं का लाभ उठाने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।
हर परिवार निभाए अपनी जिम्मेदारी
डॉ. रमा मौर्या के अनुसार पोषण माह को केवल सरकारी कार्यक्रम मानने के बजाय इसे जनआंदोलन बनाने की जरूरत है। इसके लिए प्रत्येक परिवार अपनी भूमिका निभा सकता है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत सहजन, आंवला और नींबू जैसे उपयोगी पौधे लगाए जा सकते हैं। घर में छोटे स्तर पर किचन गार्डन विकसित कर पालक, धनिया, हरी मिर्च जैसी मौसमी सब्जियां भी उगाई जा सकती हैं।
पोषण की जिम्मेदारी केवल महिलाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों और माताओं के खान-पान, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय तथा चिकित्सकीय सलाह में पुरुषों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
मोटे अनाज और पारंपरिक भोजन को दें बढ़ावा
दैनिक भोजन में गेहूं और चावल के साथ बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाजों को शामिल करना लाभकारी हो सकता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मौसमी फल, सब्जियां, दालें, अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भोजन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
वहीं अत्यधिक चीनी, नमक और तेल वाले पैकेटबंद एवं अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन को सीमित करने की आवश्यकता है। स्थानीय और पारंपरिक भोजन को प्राथमिकता देकर कम लागत में भी पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जा सकता है।
सामूहिक प्रयास से ही बनेगा सुपोषित भारत
पोषण केवल भोजन तक सीमित विषय नहीं है। इसका संबंध स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण और परिवार की जीवनशैली से भी है। यदि परिवार, आंगनबाड़ी, विद्यालय, स्वास्थ्यकर्मी, पंचायत और समाज मिलकर प्रयास करें तो कुपोषण, एनीमिया, कम वजन और बच्चों में विकास संबंधी समस्याओं को कम करने की दिशा में प्रभावी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
सुपोषित भारत का निर्माण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि प्रत्येक परिवार की जागरूकता और सहभागिता से संभव है। इसलिए राष्ट्रीय पोषण माह को जनभागीदारी का अवसर बनाते हुए स्वस्थ भोजन, बेहतर जीवनशैली और पोषणयुक्त भविष्य की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है।
प्रदीप मिश्रा, प्रमुख संवाददाता
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