बेमिसाल है गायत्री जायसवाल की सरकारी नौकरी के लिए की गई मेहनत

गोंडा
बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच भी जारी रहा गायत्री का पढ़ाई का जुनून, मेहनत से हासिल की सरकारी नौकरी
कस्तूरबा गांधी विद्यालय की लेखाकार गायत्री जायसवाल ने पेश की संघर्ष, समर्पण और सफलता की प्रेरणादायी मिसाल
प्रदीप मिश्रा, प्रमुख संवाददाता

Gonda News
गोंडा। कहते हैं कि यदि मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो और लक्ष्य को पाने का संकल्प मजबूत हो तो परिस्थितियां कभी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। संसाधनों की कमी, नौकरी की जिम्मेदारी और परिवार की व्यस्तताओं के बीच भी निरंतर मेहनत जारी रखी जाए तो मंजिल हासिल की जा सकती है। ऐसी ही प्रेरणादायी कहानी कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय हलधरमऊ में लेखाकार के पद पर कार्यरत गायत्री जायसवाल की है, जिन्होंने नौकरी, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी और आखिरकार उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग यूपीएससी की असिस्टेंट अकाउंटेंट/ऑडिटर परीक्षा में सफलता हासिल कर अपने सपने को साकार कर लिया।
गायत्री जायसवाल की यह सफलता केवल एक सरकारी नौकरी हासिल करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो परिवार और नौकरी की जिम्मेदारियों के कारण अपने सपनों को पीछे छोड़ देती हैं। गायत्री ने साबित किया कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो घर-परिवार, बच्चों और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच भी अपने लक्ष्य के लिए समय निकाला जा सकता है।
वर्ष 2010 में शुरू हुआ नौकरी का सफर
गायत्री जायसवाल ने बताया कि उन्होंने जुलाई 2010 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तरबगंज में संविदा पर लेखाकार के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। नौकरी की शुरुआत के साथ ही उसी वर्ष उन्हें मातृत्व सुख भी प्राप्त हुआ और वह एक बेटे की मां बनीं। एक ओर नई नौकरी की जिम्मेदारी थी तो दूसरी ओर छोटे बच्चे की देखभाल। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों से घबराने के बजाय दोनों जिम्मेदारियों को संतुलित करते हुए अपने कार्य को पूरी निष्ठा से जारी रखा।
उनका कहना है कि नौकरी के शुरुआती दौर में बच्चे की देखभाल और कार्यालय की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था, लेकिन परिवार के सहयोग और अपने आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने हर चुनौती का सामना किया।
स्थानांतरण के बाद शुरू हुआ नया अध्याय
अक्टूबर 2020 में उनका स्थानांतरण कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय हलधरमऊ में हुआ। गायत्री के लिए यह उनके जीवन का एक नया अध्याय था। नई जगह, नई जिम्मेदारियां और बदलती पारिवारिक परिस्थितियों के बीच उन्होंने अपने काम को जारी रखा।
वर्ष 2021 में उन्होंने एक बेटी का स्वागत किया। अब उनके सामने दो बच्चों की जिम्मेदारी थी। इसके साथ ही विद्यालय और कार्यालय के काम की जिम्मेदारी भी लगातार बनी रही। वह विद्यालय में लेखाकार के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करने के साथ ही बच्चों को पढ़ाने और अन्य विद्यालयी कार्यों में भी योगदान देती रहीं। इसी दौरान उनके मन में सरकारी नौकरी हासिल करने का सपना और मजबूत होता गया।
कोचिंग का समय नहीं मिला तो खुद बनाई पढ़ाई की राह
गायत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाई के लिए समय निकालने की थी। दिनभर विद्यालय की ड्यूटी, कार्यालय का काम, घर की जिम्मेदारियां और बच्चों की देखभाल—इन सबके बीच नियमित कोचिंग करना उनके लिए संभव नहीं था। लेकिन उन्होंने इसे कमजोरी नहीं बनने दिया।
उन्होंने बताया कि उनके पास कोचिंग जाने के लिए अलग से समय नहीं था। इसलिए उन्होंने ऑनलाइन माध्यम और उपलब्ध अध्ययन सामग्री के जरिए खुद तैयारी शुरू की। खाना बनाने, बच्चों की देखभाल करने और घर के दूसरे कामों के बीच जो भी समय मिला, उसे उन्होंने पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया।
कई बार बच्चों को पढ़ाते हुए खुद भी पढ़ाई करती थीं। परिवार के कामकाज के बीच मिलने वाले छोटे-छोटे समय को उन्होंने अपनी तैयारी का हिस्सा बना लिया। उनका मानना था कि पढ़ाई के लिए घंटों का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध समय का सदुपयोग करना जरूरी है।
पहली कोशिश में नहीं मिली सफलता, लेकिन हौसला नहीं टूटा
जुलाई 2023 में उन्होंने UPSSSC Auditor/Assistant Accountant का फॉर्म भरा। परीक्षा जनवरी 2025 में हुई, लेकिन इस प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। परीक्षा में असफलता के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
गायत्री बताती हैं कि असफलता के बाद उन्होंने अपनी कमियों का आकलन किया और पहले से अधिक मेहनत के साथ दोबारा तैयारी शुरू कर दी। लेखा विभाग में उनकी विशेष रुचि थी और इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का उनका जुनून लगातार बना रहा।
इसके बाद उन्होंने फरवरी 2024 में Assistant Accountant/Auditor की परीक्षा के लिए आवेदन किया। इस बार उन्होंने अपनी तैयारी को और व्यवस्थित किया तथा पूरी लगन और मेहनत के साथ परीक्षा की तैयारी में जुट गईं।
खाना बनाते और बच्चों को समय देते हुए भी जारी रही पढ़ाई
गायत्री की तैयारी की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इसके लिए अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को नहीं छोड़ा। वह दिनभर विद्यालय में काम करतीं, बच्चों को पढ़ातीं और फिर घर की जिम्मेदारियां निभातीं। इसके बावजूद जब भी समय मिलता, वह पढ़ाई में जुट जातीं।
उन्होंने बताया कि कई बार खाना बनाने के समय या बच्चों के साथ रहते हुए भी ऑनलाइन क्लास और अध्ययन सामग्री का सहारा लिया। उनके लिए पढ़ाई किसी एक निश्चित समय की गतिविधि नहीं रही, बल्कि वह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई।
लगातार मेहनत और तैयारी के 16 फरवरी 2025 को उन्होंने UPSSSC Assistant Accountant की परीक्षा दी। परीक्षा के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्हें विश्वास था कि इस बार उनका चयन जरूर होगा।
अक्टूबर 2025 में दस्तावेज सत्यापन (DV) से संबंधित परिणाम आया तो वह दस्तावेज सत्यापन के लिए योग्य घोषित हुईं। यह उनके संघर्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके बाद चयन के अंतिम परिणाम का इंतजार शुरू हुआ।
आखिरकार 12 अगस्त 2026 का दिन गायत्री के जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आया। UPSSSC Assistant Accountant परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ और इस बार उनका अंतिम रूप से चयन हो गया।
परिणाम सामने आते ही वर्षों की मेहनत, संघर्ष और त्याग की तस्वीर उनकी आंखों के सामने घूम गई। जिस सपने के लिए उन्होंने नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच लगातार पढ़ाई की थी, वह सपना अब हकीकत बन चुका था।
गायत्री के लिए यह सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने यह मुकाम किसी विशेष सुविधा या अतिरिक्त समय के सहारे नहीं, बल्कि अपनी इच्छाशक्ति, अनुशासन और मेहनत के बल पर हासिल किया।
परिवार बना सबसे बड़ा सहारा
गायत्री अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार को देती हैं। उनका कहना है कि उनकी मां, भाई-बहन और भाभी सहित परिवार के सभी सदस्यों ने उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया। उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
उनके ससुर डीवी इंटर कॉलेज में लेक्चरर रहे हैं और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। गायत्री के अनुसार उनके ससुर ने उन्हें बेटी से बढ़कर सम्मान दिया और हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
वहीं उनकी सास अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द आज भी गायत्री के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। वह अक्सर कहती थीं कि भले ही वह खुद पढ़ नहीं सकीं, लेकिन उनकी बहू नौकरी करे, परिवार का सम्मान बढ़ाए और जीवन में लगातार आगे बढ़े। गायत्री का कहना है कि सास की यह इच्छा उनके लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रही।
बच्चों के लिए बनीं प्रेरणा
गायत्री की सफलता का सबसे भावुक पहलू यह है कि आज वह अपने बच्चों के लिए स्वयं एक प्रेरणा बन गई हैं। उन्होंने जिस संघर्ष के बीच पढ़ाई की, उनके बच्चे उसे करीब से देखते रहे।
उनका बेटा वर्तमान में फातिमा स्कूल, गोंडा में कक्षा-10 का छात्र है। वह अपनी मां की मेहनत से प्रभावित है और भविष्य में उनकी तरह मेहनत करते हुए डॉक्टर बनने का सपना देखता है।
गायत्री का कहना है कि बच्चों को सफलता का सबसे बड़ा पाठ केवल किताबों से नहीं, बल्कि अपने आचरण और संघर्ष से सिखाया जा सकता है। उन्होंने अपने बच्चों के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि जिम्मेदारियां चाहे कितनी भी हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।
सहकर्मियों और छात्राओं के बीच भी बनीं मिसाल
गायत्री की सफलता से उनके परिवार के साथ-साथ विद्यालय के स्टाफ और छात्राओं में भी खुशी का माहौल है। विद्यालय में उनके सहकर्मी और छात्राएं उनकी मेहनत और उपलब्धि से प्रभावित हैं।
जिस विद्यालय में वह लंबे समय से अपने दायित्वों का निर्वहन करती रही हैं, वहीं अब उनकी सफलता छात्राओं के लिए भी प्रेरणा का संदेश बन गई है। गायत्री का संघर्ष यह बताता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, निरंतर प्रयास करने वाला व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
महिलाओं के लिए संदेश—समय नहीं, संकल्प जरूरी
गायत्री जायसवाल की कहानी उन महिलाओं के लिए खास संदेश देती है जो परिवार, नौकरी और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को पूरा करने में कठिनाई महसूस करती हैं। उनका मानना है कि सफलता के लिए सबसे जरूरी है संकल्प, निरंतरता और खुद पर विश्वास।
उनकी कहानी में न तो आसान परिस्थितियां थीं और न ही पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय। लेकिन उन्होंने उपलब्ध समय का इस्तेमाल किया। असफलता मिलने के बाद भी प्रयास नहीं छोड़ा और अंततः सफलता हासिल की।
गायत्री की उपलब्धि यह साबित करती है कि सफलता उम्र, परिस्थिति या जिम्मेदारियों की मोहताज नहीं होती। जरूरत केवल लक्ष्य के प्रति ईमानदारी और उसे हासिल करने के लिए लगातार मेहनत करने की होती है।
12 / 100 SEO Score
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *