विदेशी रचनाओं में दिखता है भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रभाव

अयोध्या उत्तर प्रदेश गोंडा
विदेशी अंग्रेजी विद्वानों की रचनाओं में भी दिखाई देता है भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रभाव
श्री लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज में ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं अंग्रेजी साहित्य’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
प्रदीप मिश्रा, प्रमुख संवाददाता

Gonda News
गोण्डा। भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रभाव केवल भारतीय साहित्य और चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के अनेक साहित्यकारों और विद्वानों की रचनाओं में भी भारतीय दर्शन, आध्यात्मिकता, नैतिकता, मिथक एवं सांस्कृतिक चिंतन के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं। भारतीय ज्ञान प्रणाली विश्व बंधुत्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती है और इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण विश्वभर के विद्वानों को आकर्षित करती रही है।
यह विचार किसान डिग्री कॉलेज, बहराइच के अंग्रेजी विभाग के सहायक आचार्य एवं विभागाध्यक्ष डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने श्री लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज के ललिता शास्त्री सभागार में आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए। महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की ओर से भारतीय ज्ञान प्रणाली के अंतर्गत ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं अंग्रेजी साहित्य’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य प्रो. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली ने सदैव मानवता, विश्व बंधुत्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को केंद्र में रखा है। भारतीय चिंतन की यही व्यापकता उसे विश्व के विभिन्न समाजों और ज्ञान परंपराओं से जोड़ती है।
अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीनिवासा राव ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। मुख्य वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने अंग्रेजी साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा की यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक अंग्रेजी साहित्य में भारत को मुख्य रूप से सोने, मसालों और समृद्धि की भूमि के रूप में देखा जाता था। समय के साथ भारत की पहचान केवल भौतिक संपन्नता तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और साहित्यिक परंपराओं ने भी पश्चिमी विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया।
उन्होंने विलियम शेक्सपियर, क्रिस्टोफर मार्लो, एंड्रयू मार्वेल और जॉन मिल्टन जैसे अंग्रेजी साहित्यकारों की रचनाओं में भारत एवं भारतीय ज्ञान से जुड़े विभिन्न संदर्भों को रेखांकित किया। इसके साथ ही सर विलियम जोंस, एशियाटिक सोसायटी तथा कालिदास की कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के अनुवाद के माध्यम से भारतीय साहित्य एवं ज्ञान परंपरा के पश्चिमी जगत तक पहुंचने की प्रक्रिया को भी विस्तार से समझाया।
डॉ. तिवारी ने कहा कि भारतीय साहित्य और दर्शन की पश्चिम में स्वीकार्यता का एक महत्वपूर्ण चरण संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद के माध्यम से सामने आया। भारतीय साहित्यिक एवं दार्शनिक परंपराओं के अनुवाद ने पश्चिमी विद्वानों को भारतीय चिंतन की गहराई को समझने का अवसर दिया। उन्होंने सर एडविन अर्नोल्ड के साहित्य में भारतीय दर्शन के प्रभाव का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन अंग्रेजी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. वंदना भारतीय ने किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रभाव केवल भारतीय लेखकों तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन, आध्यात्मिकता, नैतिकता, मिथक और सांस्कृतिक चिंतन ने विश्व के अनेक साहित्यकारों के लेखन को प्रभावित किया है। भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को समझने के लिए अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
भारतीय ज्ञान प्रणाली समिति के संयोजक प्रो. मंसाराम वर्मा ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन और ज्ञान की परंपरा देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंची है। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय ज्ञान प्रणाली के विविध आयामों को समझने और उन्हें आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता का परिचय असिस्टेंट प्रोफेसर विवेक प्रताप सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन अमित वर्मा ने किया। संगोष्ठी में छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और अंग्रेजी साहित्य के बीच स्थापित व्यापक साहित्यिक एवं बौद्धिक संबंधों को समझने का महत्वपूर्ण अवसर मिला।
इस अवसर पर प्रो. अमन चंद्र, मुख्य नियंता प्रो. संदीप कुमार श्रीवास्तव, प्रो. अभय श्रीवास्तव, प्रो. जयशंकर तिवारी, प्रो. शशि बाला, डॉ. ओमप्रकाश यादव, साक्षी तिवारी सहित महाविद्यालय के अनेक शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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