सिफारिशें हड़प रही हैं उपभोक्ताओं के हिस्से की रसोई गैस

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नियमों के जाल में उलझकर रह गए हैं रसोई गैस उपभोक्ता
ओटीपी व्यवस्था, घटती आपूर्ति और बढ़ती सिफारिशों ने बढ़ाई मुसीबत, एजेंसियों पर रोज बन रहा तनाव का माहौल
घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी खाली हाथ लौट रहे लोग, आम उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे
प्रदीप मिश्रा, प्रमुख संवाददाता

Gonda News
गोंडा। रसोई गैस उपभोक्ताओं की परेशानी अब केवल घरेलू असुविधा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़ी जनसमस्या का रूप लेती जा रही है। गैस वितरण प्रणाली में लगातार बढ़ते नियम-कायदे, ओटीपी सत्यापन की अनिवार्यता, मांग के अनुरूप गैस सिलेंडरों की आपूर्ति में भारी कमी और सिफारिशों के बढ़ते दबाव ने आम उपभोक्ताओं की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि सुबह से एजेंसियों के बाहर लगने वाली लंबी कतारें अब रोजमर्रा का दृश्य बन चुकी हैं।
गर्मी, उमस और घंटों इंतजार के बावजूद जब उपभोक्ताओं को गैस नहीं मिलती, तो उनका गुस्सा एजेंसी कर्मियों पर फूट पड़ता है। कई स्थानों पर तीखी नोकझोंक, हंगामा और विवाद जैसी स्थितियां भी सामने आने लगी हैं। एजेंसी संचालक और कर्मचारी भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं, क्योंकि मांग अधिक होने के बावजूद उन्हें पर्याप्त गैस उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
ओटीपी व्यवस्था बनी हुई है बड़ी मुसीबत
तकनीकी खामियों और नेटवर्क समस्या से उपभोक्ता हो रहे परेशान
गैस वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लागू की गई ओटीपी व्यवस्था अब उपभोक्ताओं के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। सिलेंडर प्राप्त करने के लिए उपभोक्ताओं के मोबाइल पर आने वाला ओटीपी कई बार समय पर नहीं पहुंचता। ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क समस्या के कारण उपभोक्ता घंटों इंतजार करते रहते हैं, जबकि एजेंसी कर्मी नियमों के चलते बिना ओटीपी गैस देने में असमर्थ रहते हैं।
कई बुजुर्ग उपभोक्ता और अशिक्षित परिवार तकनीकी प्रक्रिया को समझ नहीं पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें बार-बार एजेंसी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उपभोक्ताओं का कहना है कि व्यवस्था को सरल बनाने के बजाय और अधिक जटिल बना दिया गया है।
रसोई गैस की है मांग अधिक, मगर आपूर्ति कम
सीमित स्टॉक के कारण एजेंसियों पर बढ़ रहा दबाव
गैस एजेंसियों का कहना है कि वर्तमान समय में मांग की तुलना में बहुत कम सिलेंडर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। रोजाना सैकड़ों उपभोक्ता गैस लेने पहुंच रहे हैं, लेकिन एजेंसियों के पास सीमित स्टॉक होने के कारण सभी को सिलेंडर देना संभव नहीं हो पा रहा।
कई एजेंसियों में स्थिति यह हो गई है कि सुबह पहुंचे लोगों को ही गैस मिल पाती है, जबकि देर से आने वाले उपभोक्ताओं को अगले दिन आने की सलाह देकर वापस भेजना पड़ता है। इससे लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है। एजेंसी संचालकों का कहना है कि उपभोक्ताओं का गुस्सा उन्हें झेलना पड़ रहा है, जबकि आपूर्ति व्यवस्था उनके नियंत्रण से बाहर है।
सिफारिशें हड़प ले रही हैं उपभोक्ताओं के हिस्से की गैस 
प्रभावशाली लोगों के कारण आम उपभोक्ताओं में बढ़ रहा असंतोष
गैस संकट के बीच सिफारिशों का खेल भी तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि दबंग, प्रभावशाली लोग और सरकारी तंत्र से जुड़े कुछ लोग अपने प्रभाव का उपयोग कर प्राथमिकता के आधार पर सिलेंडर हासिल कर लेते हैं। इससे घंटों लाइन में लगे सामान्य उपभोक्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है।
कई उपभोक्ताओं का आरोप है कि एजेंसियों पर सिफारिशी फोन और दबाव लगातार बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें वास्तव में गैस की आवश्यकता होती है।
कालाबाजारी ने बढ़ाई हुई उपभोक्ताओं के लिए मुसीबत
कम उपयोग वाले परिवारों के कार्ड जुटाकर खेल रहे ब्लैकिए
रसोई गैस संकट के पीछे कालाबाजारी को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार कुछ ब्लैक मार्केटिंग करने वाले लोगों ने ऐसे परिवारों के गैस कार्ड इकट्ठा कर लिए हैं, जिनके यहां गैस की खपत कम होती है। इन्हीं कार्डों के माध्यम से बार-बार सिलेंडर हासिल करने की कोशिश की जाती है।
बताया जाता है कि ऐसे लोग एजेंसियों पर लाइन लगाने, गैस न मिलने पर अधिकारियों से शिकायत करने और एजेंसी कर्मचारियों से बहस करने में सबसे आगे रहते हैं। कई बार यह लोग आम उपभोक्ताओं की तरह खुद को प्रस्तुत कर व्यवस्था का फायदा उठा लेते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन कालाबाजारी पर सख्ती से कार्रवाई करे तो काफी हद तक स्थिति सुधर सकती है।
गैस वितरण में एजेंसी कर्मियों के भी छूट रहे पसीने झेलनी पड़ रही तीखी झड़पें
उपभोक्ताओं के गुस्से और नियमों के दबाव के बीच फंसे कर्मचारी
एक तरफ उपभोक्ताओं का बढ़ता दबाव और दूसरी ओर कंपनियों के सख्त नियमों ने एजेंसी कर्मियों की स्थिति भी कठिन बना दी है। कर्मचारियों को हर दिन सैकड़ों लोगों की शिकायतें सुननी पड़ रही हैं। कई बार मामूली बातों पर विवाद की नौबत आ जाती है।
एजेंसी संचालकों का कहना है कि यदि पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और वितरण व्यवस्था को व्यावहारिक बनाया जाए, तो विवाद की स्थिति काफी हद तक खत्म हो सकती है।
समाधान की ओर टिकी निगाहें
मांग के अनुरूप आपूर्ति और पारदर्शी व्यवस्था ही निकाल सकती है रास्ता
स्थानीय लोगों और उपभोक्ताओं का मानना है कि जब तक मांग के अनुरूप पर्याप्त गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे और वितरण प्रणाली में पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी, तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी। लोगों ने प्रशासन और गैस कंपनियों से कालाबाजारी पर कठोर कार्रवाई, सिफारिश संस्कृति पर रोक और आम उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने की मांग की है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि रसोई गैस आज हर परिवार की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। ऐसे में वितरण व्यवस्था को सरल, पारदर्शी और जनहितकारी बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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